Informational Essay On Chhatrapati Shivaji Maharaj History In Hindi

Informational Essay On Chhatrapati Shivaji Maharaj History In Hindi – शिवाजी’ महाराज का जन्म 10 अप्रैल 1627 को शिवनेर के एक पहाड़ी किले में हुआ था। यह किला पुणे के उत्तर में स्तिथ है। उनकी मां का नाम जीजाबाई था। वह एक बहुत धार्मिक स्त्री थीं। उनकी माता को विश्वास था कि उनका पुत्र हिन्दू धर्म और उसकी सभ्यता का महान संरक्षक करेगा।

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छत्रपति शिवाजी पर निबंध

छत्रपति शिवाजी का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है । वो महावीर होने के साथ साथ माहा गुरु भक्त भी थे । यह सच है की यदि किसि के व्यक्तित्व में शुद्ध सोने सा निखर आता है तो उसके पीछे किसी पारसमणि का हाथ अवश्य है । शिवाजी के जीवन में वो पारसमणि थे स्वयं गुरु रामदास जी। विरक्तो सा जीवन जीने वाले रामदास जी देखने में जितने साधारण थे उनकी अंतर आत्मा में परमज्ञान की उतनी विलक्षण ज्योति प्रज्वलित थी ।

उन्होंने दासबोध जैसे महँ ग्रन्थ की रचना करके अपने विलक्षण ज्ञान का परिचय दिया । जब गुरु रामदास की शिवाजी से भेट हुई तो उन्हें उस मानव प्रतिमा में सोई पड़ी प्रबल उर्जा का आभास हुआ और शिवाजी को अपना शिष्य स्वीकार किया । इस प्रकार एक समर्थ गुरु की देख रेख में उनकी शिक्षा आरम्भ हुई ।

बालक शिव पूर्ण लगन के साथ दिए गए ज्ञान का अमृत पालन करने लगे । दासबोध ग्रन्थ में वर्णित दिव्य ज्ञान का प्रसाद भी शिवाजी को मिला । गुरु ने अपनी दृष्टि से जन लिया था की शिव को शास्त्र ज्ञान के अलावा शस्त्र ज्ञान की भी आवशयकता भी पड़ेगी, इसलिए शिव को शस्त्र संचालन का ज्ञान भी दिया जाने लगा ।

अपनी एकाग्रता और गुरु पर पूर्ण श्रधा रखने के कारण शिवाजी ने शिग्र ही शास्त्रों और शस्त्रों का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया लेकिन फिर भी शिव की जिज्ञासा शांत ना होती थी और शिवाजी की उस्सी जिज्ञासा के कारण गुरु भी अपना सम्पूर्ण ज्ञान अपने शिष्य में दे देना चाहते थे ।

गुरु रामदास को अपने योग्य शिष्य शिवाजी की निष्ठा पर कोई संदेह तो नहीं था फिर भी वो शिवाजी की एक परीक्षा लेना चाहते थे । एक सुबह उन्होंने अपने सभी शिष्यों को पुकारा और कहा की अब कुछ दिन वो उनको शिक्षा ना दे सकेंगे क्युकी उनके पांव में एक भयंकर फोड़ा उग आया है, जो पकने के कारण भिसन पीड़ा दे रहा है । गुरु रामदास के पांव में पट्टी बंधी थी । पांव फुला फुला और भयंकर सा दिखाई दे रहा था । कुछ शिष्य तो इतने डर गए की रोने लगे । कुछ ने मुहं फेर लिया और कुछ ने सहस करके गुरु से पूछा “आप तो समर्थवान है गुरुदेव इस फोड़े से छुटकारा पाने का कोई तो उपाए अवश्य जानते होंगे “।

गुरु ने आह भरी और कहा “नहीं वत्स इसका कोई उपाए में जनता होता तो अवस्य ही इससे छुटकारा प् लेता । लगता है मेरे द्वारा पूर्व जनम में किये गए किसी अपराध का फल है । गुरुदेव क्या हम आपकी कोई सहायता कर सकते है । शिव ने उत्सुकता से पूछा “हाँ हाँ गुरुदेव हमे भी बताये की हम आपका पूर्ण रूप से कष्ट दूर करने का प्रयत्न करेंगे ।

गगुरु रामदास बोले “हाँ वत्स एक उपाय तो है परन्तु वह बहुत मुश्किल है । में तुम्हे बताना तो नहीं चाहता लेकिन तुम सब पुच रहे तो बता देता हूँ । यदि इस फोड़े का मवाद कोई अपने मुख से खीचकर निकाल दे तो मुझे निश्चित ही आराम मिल सकता है ।

अब उनकी नज़र सहायता के लिए अपने शिष्यों पर थी । सभी शिष्य एक दुसरे का मुख ताक रहे थे । किसी से कोई उतर देते ना बन रहा था । गुरु ने पुनः पूछा “क्या तुममे से कोई मुझे पीड़ा से मुक्ति दिला सकता है या में फिर विश्राम के लिए चला जाऊ “।

“में दिलाऊंगा आपको पीड़ा से मुक्ति “। में अपने मुख से निकालूँगा आपको पीड़ा देने वाला यह मवाद “। शिवाजी ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ आगे बढकर कहा । गुरु रामदास को शिव से ऐसी ही आशा थी और उन्होंने तुरंत अपना पांव आगे किया और फोड़े से थोड़ी सी पट्टी हटाकर शिव से कहा “ लो वत्स अब दर ना करो मुझे असहनीय पीड़ा हो रहे है “।

शिवाजी ने आँख मूंदकर इश्वर से प्रार्थना की और गुरु के चरण स्पर्श करके उनके घाव में अपना मुख लगा दिया । ये क्या उस फोड़े पर मुख लगते ही शिवाजी हैरान रह गए, वो मवाद नहीं आम का रस था । उनके गुरु ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए एक पके आम को अपने पांव पर बंद लिया था ।

शिवाजी ने आशचर्य भरी दृष्टि से जब गुरु को देखा तो उनकी आँखों से प्रेमासु बरस रहे थे । उन्होंने शिवाजी को अपने ह्रदय से लगा लिया और कहा “ तूने मेरी दी गए शिक्षा को सार्थक कर दिया और में तुझे आशीर्वाद देता हूँ की इस संसार में तेरी कीर्ति अमर हो जाएगी, तेरा नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा ।

गुरूजी का आशीर्वाद शिवाजी के जीवन में फलीभूत हुआ, उनमें निर्भी कता अन्याय से लड़ने की शमता और संघतात्मक योगदान का विकास गुरु की कृपा से ही आया । शिवाजी ने अन्याय के विरुद्ध लड़ने का फैसला किया , उनके नेत्रित्व में जो लड़ता था वो साक्षात् शिव का रूप नज़र आता था । उनके आक्रमणों से दुश्मन थरा उठता था ।

सिवाजी के युद्ध का उदेष रक्तपात नहीं बल्कि अन्याय का अंत करके शांति को स्थापित करना था जिनमे उन्हें इचित सफलता प्राप्त हुई और शिव से छत्रपति शिवाजी बन गए । अब शिवाजी सम्पूर्ण मराठा साम्राज्य में एक मात्र अधिपति थे ।

शिवाजी की विजय यात्रा उनके गुरु के कानों में अक्सर पहुचती रहती थी । एक बार उनके गुरु उनके साम्राज्य में भिक्षा मांगने पहुचे और आवाज़ लगाई । उनकी आवाज़ सुनकर शिवाजी आदोलित हो गए और सब कम छोड़कर द्वार पर पहुचे और गुरु के चरणों में गिर गए । गुरु रामदास ने उन्हें उठाया और कहा : अब तू मेरा शिष्य नहीं सम्राट है, में तो भिक्षा की आशा लेकर यहाँ आया था, क्या मुझे कुछ भिक्षा मिलेगी । गुरु का आग्रह सुनकर एक शन्न तो शिवाजी स्तभ्द रह गए । उन्हें लगा की उनकी किसि अनजानी भूल की वजह से उनके गुरु ने उनका त्याग तो नहीं कर दिया ।

“किस सोच में पद गए राजन” गुरु रामदास ने पुनः कहा “क्या मुझे भिक्षा मिलेगी । गुरु की वाणी ने शिवाजी की तंद्रा भंग की । “हाँ गुरुदेव में अभी आया“। शिवाजी तुरंत अपने कक्ष में आये और एक कागज़ का टुकड़ा ले कर लोटे और गुरु के भिक्षा पात्र में डालकर बोले “ में आपको क्या दे सकता हूँ यह सब कुछ तो आप हे का दिया हुआ है “।

शिवाजी ने गुरु को प्रणाम किया “ गुरूजी उनको आशीर्वाद देके आगे चले गए। कुटिया में आकर रामदास जी ने उस पर्चे को पड़ा । उसमें लिखा था “ सारा राज्य आपको समर्पित है और उसके निचे राज्मोहर भी अंकित थी “। समर्थ गुरु रामदास जी ने अपने शिष्य की दान की सराहना की इश्वर का धन्यवाद किया की उनकी शिक्षा में कोई त्रुटी नहीं रही ।

यह एक समर्थ गुरु के समर्थ शिष्य की कहानी है जो सदीओ तक एक विराग्य गुरु और एक त्यागी शिष्य की याद दिलाती रहेगी । सच तो यह है की जिससे गुरु कृपा प्राप्त हो जाती है उसके लिए संसार के सरे साधन सुलब हो जाते है । आग का तपता दरिया भी उसके लिए शीतल हो जाता है ।

छत्रपति शिवाजी महारज की ये कहानी आपको अवश्यक पसंद आई होगी । आपके लिए हमारे पास छत्रपति शिवाजी महाराज की वॉलपेपर कलेक्शन भी है जिससे जरुर देखे ।

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