आतंकवाद पर निबंध – Essay On Terrorism (aatankwad) In Hindi Language

आतंकवाद पर निबंध – Essay On Terrorism (aatankwad) In Hindi Language – हिंसापूर्वक ढंग से आम लोगों को डराने के लिये आतंकवाद का प्रयोग किया जाता है और ये एक गैर-कानूनी कृत्य है। इसका इस्तेमाल आम लोगों और सरकार को डराने-धमकाने के हेतु हो रहा है । यह एक सामाजिक मुद्दा बन गया है ।

आतंकवाद पर निबंध - Essay On Terrorism (aatankwad) In Hindi Language

आतंकवाद पर निबंध – Essay On Terrorism (aatankwad) In Hindi Language

आतंकवाद पर निबंध – Essay On Terrorism (aatankwad) In Hindi Language

आतंकवाद का उद्देश्य अपनी समस्या के प्रति लोगो का ध्यान आकर्षित करना होता है और इसके लिए वह निरपराध लोगो की हत्या एवं सम्पति के नुकसान जैसे मार्गो का सहारा लेता है । वह अपने को अनाधिकृत युद्ध का योधा समझता है, जिसका उदेश्य राजनितिक होता है और सामान्यत: अपने पक्ष को वह मानवाधिकार से जोड़ने की कोशिश करता है ।

जाहिर है की , आतंकवादी को अपने द्वारा अख्तियार किया गया रास्ता न्यायोचित लगता है । वैसे हमे इस पर किसी प्रकार का मंतव्य देने से पहले अतंकवादियो के मुद्दों एवं उनके कार्य करने के तरीको का विशेषण कर लेना चाहिए ।

आज किसी ना किसी रूप में विश्व के लगभग हर देश को आतंकवाद की समस्या का सामना करना पड़ रहा है । उदेश्यों की प्राप्ति करने के लिए आतंकवाद आज क्यों इतना लोकप्रिय माध्यम बनता जा रहा है ? इसके अनेक राजनितिक, आर्थिंक और सामाजिक कारण बताये जा रहे है ।

सतासीन सरकार किसी व्यक्ति या समूह की राजनितिक इच्छा या महत्वाकंषा जो की सरकार से टकराती है, को गंभीरता से ले इसलिए आतंकवादी द्वारा हिंसा का सहारा लिया जाता है । राजनितिक असंतोष एवं द्वेष आजकल आतंकवाद में परिवर्तित हो रहा है क्योकि सत्ता पर काबिल व्यवस्था आज स्वयं भ्रष्ट होने लगी है ।

लगभग सभी प्रजातान्त्रिक देशो में सविधानो के द्वारा सबको समान अधिकार देने की व्यवस्था की गयी है, लेकिन अक्सर किसी वर्ग विशेष के साथ भेदभाव होने जैसी बात देखि जाती है । कभी कभी किसी कानून का सही तरीके से इस्तेमाल ना होने के मामले भी होते है । संस्थाओ के अपराधीकरण से भी असंतोष बढता है । एक हद तक ये ही वे स्थितिया है जो सामाजिक आर्थिक असंतोष को जन देती है ।

ऐसे में कोई आतंकवादी संगठन आम जनता के हित में सामाजिक संरचना के पुनर्गठन एवं आर्थिक स्तिथि में सुधर के लिए राजनितिक उद्देश्य निश्चित कर हिंसक गतिविधिया शुरू कर देता है । अपने समूह के आर्थिक एवं सामाजिक विकास की दलीलों से प्रभावित होकर आम आदमी भी आतंकवाद में लिप्त हो जाता है । भारत में आतंकवाद का लगभग यही स्वरुप है ।

कभी कभी किसी मामले में आतंकवाद का कोई तर्कपूर्ण एवं न्यायोचित आधार भी हो सकता है, परन्तु ऐसी स्थितिया बहुत कम देखनो को मिलती है । ऐसे मामलो में भी आतंकवादी अपने मुद्दे के प्रति अविवेकपूर्ण तरीके से हिंसक हो उठता है और फिर अपनी हिंसा को भी उचित सिद्ध करने की कोशिश करता है। वह हिंसा को अपने प्रतिरोध का उपयुक्त मध्यम भी मान सकता है । वह अपना निशाना किसी भी स्थान या व्यक्ति को बना सकता है ।
आतंकवादी हत्यारे से उस बिंदु पर भीं होता है जब वह एक सामूहिक उदेश्य से हिंसा में सलंग्न होता है । राजनितिक हत्याओ का लक्ष किसी खास व्यक्ति को उसके व्यक्तिगत अपराध या संस्थागत अपराध के लिए दण्डित करना होता है ।

जबकि हत्यारे का उदेश्य किसी पदाधिकारी को उसके पद से हटाकर किसी दुसरे को बैठाने का हो सकता है, जबकि आतंकवादी का उदेश्य सिर्फ उससे नुकसान पहुचने का होता है । इसी प्रकार आतंकवादी गतिविधिओ में हत्याए भी हो सकती है, इसलिए सभी हत्याए आतंकवादी गतिविधिया नहीं समझी जा सकती ।

आतंकवादी अक्सर किसी हिंसा आदि की जिमीदारी अपने ऊपर ले लेते है , जिसके पीछे उनका उद्देश्य अपना प्रचार करना होता है । कभी कभी अपरहण को भी गलती से आतंवादी गतिवधियो में गिन लिया जाता है । अपरहण कर्ताओ की मांग धन इत्यादि होती है और ऐसा प्रयास किसी आतंकवादी संघटन द्वारा धन प्राप्ति के लिए किये जा सकते है ।

क्युकी हिंसा कभी आपतिजनक नहीं होती – किसी व्यक्ति या समूह द्वारा अपने अस्तित्व की रक्षा के प्रयास में अपनी अस्मिता की रक्षा के प्रयास में हिंसा का प्रयोग उचित हो जाता है । हिंसा भी एक शक्ति का रूप होती है । परन्तु आतंकवादी हिंसा इसलिए निंद्निये हो जाती है, उसके शिकार निरपराध आम नागरिक हो जाते है ।

आतंकवादी आम आदमियो को इसलिए अपना निशाना बनाते है क्युकी एक तो वह सहेज सुलभ है और दुसरे उनकी हत्या संभवता उनकी अभिव्यक्ति के लिए बेहतर माध्यम है । इसके पीछे यह मत है की जब आम लोग इस हिंसा का शिकार होंगे तो शेष आम आदमी भी दहशत में आ जायेंगे जिनकी संक्या अधिक है और उनकी दहशत सरकार या अन्य लक्षित प्राधिकार पर अधिक दबाव डालेगी ।

कभी कभी आतंकवादी अपनी हिंसा की तुलना सीमा पर लड़े जाने वाले युद्ध से करते है और उससे भी न्यायोचित बताते है । क्युकी युधो का उदेष थोड़ी हिंसा के द्वारा बड़ी जनसंख्या के जानमाल की रक्षा करना होता है जबकि आतंकवादी हिंसा में ऐसी कोई बात नहीं होती ।

आतंकवादी जैसे ही हिंसक रास्ता अखित्यार कर लेता है उसके उदेश्यों का नैतिक आधार ही समाप्त हो जाता है । यदि आतंवादी अपने को मानवाधिकारों का योधा मानता है तो पहले उसे मानव के जीवन का महत्व समझना चाहिए । अपने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दुसरो के मानवाधिकारों का हनन करना उचित नहीं है ।

यदि हम इसके नैतिक पहलु को भी नज़र अंदाज़ कर दे तो भी व्यावहारिक दृष्टि से भी इसका कोई ओचित्य सिद्ध नहीं होता, क्युकी शायद ही आतंकवादी संगटन अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में कभी सफल होते है , सिवाए बड़े पैमाने पर हिंसा एवं विद्वंस करने के ।

इसी प्रकार “ग्लोबल वार्मिंग” और “जल ही जीवन है” भी आज के समाज में महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए है इस्नके बारे में भी जानना अति अवशयक हो गया है ।

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